जमशीद अल-काशी और दशमलव भिन्न का उद्भव
पंद्रहवीं सदी के तैमूरी पुनर्जागरण में गणितीय क्रांति और 'मिफ़्ताह अल-हिसाब' का ऐतिहासिक योगदान
जमशीद ग़ियाथ अल-दीन अल-काशी 15वीं शताब्दी के एक मूर्धन्य फ़ारसी गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे, जिन्होंने दशमलव भिन्नों के व्यवस्थित सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उनकी प्रसिद्ध रचना 'मिफ़्ताह अल-हिसाब' और पाई (π) की 16 दशमलव स्थानों तक की गई गणना ने मध्यकालीन अंकगणित को एक आधुनिक गणितीय आधार प्रदान किया।
Key takeaways
- अल-काशी ने 1427 ईस्वी में 'मिफ़्ताह अल-हिसाब' (अंकगणित की कुंजी) पूरी की, जिसमें दशमलव भिन्नों को दैनिक गणनाओं के लिए पूर्ण प्रणाली के रूप में प्रस्तुत किया गया।
- उन्होंने 1424 ईस्वी में 'अल-रिसाला अल-मुहीतिया' में पाई ($2\pi$) का मान षष्ट्यांश में 9 और दशमलव में 16 स्थानों तक शुद्ध निकाला, जो अगले 170 वर्षों तक विश्व रिकॉर्ड रहा।
- अल-काशी ने $3 \times 2^{28}$ भुजाओं वाले बहुभुज के माध्यम से वृत्त की परिधि का सटीक विश्लेषण कर आधुनिक कलन (calculus) के पूर्ववर्ती रूपांकनों को प्रस्तुत किया।
- यूरोपीय गणितज्ञ साइमन स्टीविन द्वारा 1585 ईस्वी में 'द थींडे' लिखने से 150 वर्ष पूर्व अल-काशी ने दशमलव अंशों के जोड़, घटाव, गुणा, भाग और मूल निकालने के नियम स्पष्ट कर दिए थे।
- समरकंद वेधशाला में उलुग़ बेग के मुख्य सहयोगी के रूप में उन्होंने 'ज़िज-ए सुल्तानी' के निर्माण और $\sin(1^\circ)$ की उच्च परिशुद्धता वाली गणना में केंद्रीय भूमिका निभाई।

ग़ियाथ अल-दीन जमशीद मसूद अल-काशी (लगभग 1380–1429 ईस्वी) मध्यकालीन फ़ारसी सभ्यता के उन शीर्षस्थ गणितज्ञों और खगोलशास्त्रियों में से थे, जिनके शोध ने आधुनिक गणित की नींव रखी। 15वीं शताब्दी के तैमूरी पुनर्जागरण (Timurid Renaissance) के केंद्र समरकंद में कार्य करते हुए अल-काशी ने दशमलव भिन्नों (decimal fractions) के सिद्धांत को वह परिपक्व स्वरूप प्रदान किया, जिसे सदियों बाद यूरोपीय गणितज्ञों ने अपनाया। प्राचीन काल से चली आ रही षष्ट्यांश (sexagesimal/base-60) प्रणाली की जटिलताओं को समझते हुए अल-काशी ने दशमलव भिन्नों को एक व्यापक और व्यावहारिक गणना पद्धति के रूप में प्रतिपादित किया, जिससे विज्ञान, व्यापार और खगोलशास्त्र में गणना की गति तथा सटीकता में क्रांतिकारी परिवर्तन आया।
अल-काशी का जन्म मध्य ईरान के काशान नगर में हुआ था। यह काल मध्य पूर्व में तैमूरलंग के सैन्य अभियानों और उसके पश्चात स्थापित तैमूरी साम्राज्य के स्थिरीकरण का था। विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों और दरिद्रता के बावजूद अल-काशी ने गणित और खगोलशास्त्र का गहन अध्ययन किया। उनकी अद्वितीय बौद्धिक प्रतिभा को तैमूर के पौत्र, विद्वान शासक मिर्ज़ा उलुग़ बेग ने पहचाना और उन्हें समरकंद आमंत्रित किया। समरकंद में 1420 के दशक में स्थापित प्रसिद्ध समरकंद वेधशाला और मदरसे में अल-काशी मुख्य वैज्ञानिक बने। यहाँ उन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं 'अल-रिसाला अल-मुहीतिया' (The Treatise on the Circumference, 1424) और 'मिफ़्ताह अल-हिसाब' (The Key to Arithmetic, 1427) की रचना की।
दशमलव प्रणाली की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अल-काशी का नवाचार
अंकगणित के इतिहास में स्थानीय मान प्रणाली (positional notation) और शून्य की संकल्पना का विकास प्राचीन भारत में हुआ था, जिसे बाद में बगदाद के इस्लामी विद्वानों, विशेष रूप से मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख़्वारिज़्मी द्वारा व्यापक अरब और इस्लामी जगत में प्रसारित किया गया। तथापि, कई शताब्दियों तक यह स्थानीय मान प्रणाली केवल पूर्णांकों (integers) तक ही सीमित रही। भिन्नों की गणना के लिए यूनानी खगोलशास्त्र की षष्ट्यांश प्रणाली (अंश, कला, विकला या डिग्री, मिनट, सेकंड) का ही उपयोग किया जाता था, जो 60 के आधार पर कार्य करती थी। खगोलीय तालिकाओं में आधार-60 प्रणाली अत्यंत सटीक तो थी, परंतु सामान्य अंकगणित और व्यावहारिक जीवन के लिए यह बेहद जटिल और समय लेने वाली थी।
दसवीं शताब्दी में दमिश्क के गणितज्ञ अबू अल-हसन अल-उक़लीदीसी (लगभग 952 ईस्वी) और बारहवीं शताब्दी में बगदाद के यहूदी मूल के गणितज्ञ अल-समवाल अल-मग़रिबी (लगभग 1172 ईस्वी) ने दशमलव भिन्नों के प्रारंभिक संकेत दिए थे। अल-समवाल ने मूल निकालने की प्रक्रियाओं में दशमलव स्थानों का उल्लेख किया था। परंतु ये प्रयास अलग-थलग और आंशिक थे; इनमें भिन्नों को स्वतंत्र संख्याओं के रूप में स्वीकार करने और उन पर सभी बुनियादी संक्रियाओं को लागू करने का एक व्यवस्थित एवं सार्वभौमिक ढाँचा अनुपस्थित था।
जमशीद अल-काशी का ऐतिहासिक योगदान यह था कि उन्होंने पूर्ववर्ती गणितज्ञों के बिखरे हुए विचारों को एक पूर्ण, तार्किक और आत्म-निर्भर अंकगणितीय प्रणाली में संश्लेषित किया। उन्होंने सिद्ध किया कि जिस प्रकार आधार-10 की स्थानीय मान प्रणाली पूर्णांकों पर लागू होती है, ठीक उसी प्रकार यह इकाई से छोटी संख्याओं पर भी अनंत रूप से लागू हो सकती है। अल-काशी ने स्पष्ट किया कि दशमलव भिन्नों में जोड़, घटाव, गुणा, भाग और मूल निष्कर्षण (root extraction) के वही मूलभूत नियम कार्य करते हैं जो सामान्य संख्याओं पर लागू होते हैं, जिससे षष्ट्यांश प्रणाली के बोझिल परिवर्तनों की आवश्यकता समाप्त हो गई।
'मिफ़्ताह अल-हिसाब': दशमलव अंकगणित का विश्वकोश
1427 ईस्वी में पूरी हुई 'मिफ़्ताह अल-हिसाब' (अंकगणित की कुंजी) मध्यकालीन इस्लामी गणित का संभवतः सबसे उत्कृष्ट पाठ्यपुस्तक-ग्रंथ है। अल-काशी ने इस ग्रंथ को उलुग़ बेग को समर्पित किया था। ग्रंथ के प्राक्कथन में वे लिखते हैं कि उनका उद्देश्य केवल सैद्धांतिक गणितज्ञों की सेवा करना नहीं है, बल्कि खगोलशास्त्रियों, वास्तुकारों, सर्वेक्षकों, व्यापारियों और राजकोषीय अधिकारियों को एक ऐसा व्यावहारिक साधन उपलब्ध कराना है, जिससे त्रुटिरहित और त्वरित गणनाएँ संभव हो सकें।
'मिफ़्ताह अल-हिसाब' के तीसरे खंड में अल-काशी दशमलव भिन्नों के सिद्धांत और संक्रियाओं का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हैं। वे इसे 'अल-कुसूर अल-अशरिया' (दशमलव भिन्न) के रूप में परिभाषित करते हैं। अल-काशी ने दशमलव संख्याओं को लिखने के लिए एक विशेष अंकन पद्धति अपनाई। चूंकि उस समय आधुनिक दशमलव बिंदु (decimal point) का मानकीकरण नहीं हुआ था, अल-काशी ने पूर्णांक भाग और भिन्न भाग को अलग करने के लिए भिन्न के अंकों के ऊपर एक ऊर्ध्वाधर रेखा खींचने अथवा उन्हें भिन्न रंग की स्याही (प्रायः लाल स्याही) में लिखने की पद्धति प्रस्तुत की। उदाहरण के लिए, संख्या 25.37 को वे इस प्रकार लिखते थे कि 37 पूर्णांक 25 से स्पष्ट रूप से पृथक दिखाई दे।
- पूर्णांक और भिन्न का एकात्म संचालन: अल-काशी ने नियम स्थापित किया कि गुणा करते समय दशमलव अंकों की कुल संख्या को गिनकर परिणाम में उतने ही स्थान दाईं ओर से गिने जाएँ।
- मूल निष्कर्षण की व्यवस्थित कलनविधि: उन्होंने किसी भी कोटि के मूल ($n$-th root), विशेषकर वर्गमूल और घनमूल को दशमलव स्थानों की वांछित सटीकता तक निकालने की रूफ़िनी-होर्नर (Ruffini-Horner) जैसी आधुनिक पुनरावृत्ति विधि प्रस्तुत की।
- द्विपद प्रमेय (Binomial Theorem): पास्कल के त्रिकोण के पूर्ववर्ती स्वरूप का उपयोग करके उन्होंने $(a+b)^n$ के गुणांकों को सारणीबद्ध किया, जो दशमलव गणनाओं में अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ।
- षष्ट्यांश और दशमलव का अंतःरूपांतरण: खगोलीय डेटा को आधार-60 से आधार-10 में और इसके विपरीत बिना किसी त्रुटि के बदलने के लिए सटीक एल्गोरिदम तैयार किए।
पाई (π) की अभूतपूर्व गणना: 'अल-रिसाला अल-मुहीतिया'
दशमलव भिन्नों की शक्ति का सबसे भव्य और ऐतिहासिक प्रदर्शन अल-काशी ने 1424 ईस्वी में अपने लघु शोध-प्रबंध 'अल-रिसाला अल-मुहीतिया' (The Treatise on the Circumference) में किया। इस ग्रंथ का मूल उद्देश्य वृत्त की परिधि और उसके व्यास के अनुपात, अर्थात् पाई ($\pi$) का ऐसा सटीक मान प्राप्त करना था जिससे किसी भी व्यावहारिक अथवा ब्रह्मांडीय माप में त्रुटि नगण्य हो जाए। अल-काशी ने लिखा कि यदि किसी ऐसे विशाल वृत्त की कल्पना की जाए जिसका व्यास पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी से भी बड़ा हो, तो उनके द्वारा निकाले गए पाई के मान से उस वृत्त की परिधि मापने पर त्रुटि एक घोड़े के बाल की मोटाई से भी कम होगी।
इस अद्भुत सटीकता को प्राप्त करने के लिए अल-काशी ने आर्किमिडीज़ की शास्त्रीय बहुभुज सन्निकटन विधि (polygonal approximation method) को अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने एक समबाहु त्रिभुज ($n=3$) से प्रारंभ करते हुए भुजाओं की संख्या को निरंतर दोगुना किया। उन्होंने यह प्रक्रिया $3 \times 2^{28}$ भुजाओं वाले अंतर्निहित (inscribed) और परिगत (circumscribed) समबहुभुज तक जारी रखी। यह बहुभुज $805,306,368$ भुजाओं वाला एक विशाल ज्यामितीय ढाँचा था।
इस अविश्वसनीय गणना के माध्यम से अल-काशी ने $2\pi$ का मान षष्ट्यांश प्रणाली में 9 स्थानों तक और दशमलव प्रणाली में 16 दशमलव स्थानों तक पूर्णतः शुद्ध निकाला। दशमलव रूप में उनका मान था: $$2\pi \approx 6.2831853071795865$$ जिसके अनुसार $\pi$ का मान $3.1415926535897932$ प्राप्त होता है। चीनी गणितज्ञ जू चोंगझी (429–500 ईस्वी) द्वारा दिए गए 7 दशमलव स्थानों के मान के पश्चात, अल-काशी का यह परिणाम गणित के इतिहास में अगले 170 वर्षों तक विश्व की सर्वाधिक सटीक गणना बना रहा, जिसे अंततः 1596 ईस्वी में जर्मन-डच गणितज्ञ लुडोल्फ वॉन सोइलेन ने पार किया।
| गणितज्ञ / खगोलशास्त्री | सभ्यता / क्षेत्र | काल (ईस्वी) | सटीक दशमलव स्थान | प्रयुक्त विधि |
|---|---|---|---|---|
| आर्किमिडीज़ | प्राचीन यूनान (सिराक्यूज़) | लगभग 250 ईसा पूर्व | 3 | 96 भुजाओं वाला बहुभुज |
| आर्यभट्ट | प्राचीन भारत (गुप्त काल) | 499 ईस्वी | 4 | 384 भुजाओं वाला बहुभुज |
| जू चोंगझी | शास्त्रीय चीन (लियू सोंग) | लगभग 480 ईस्वी | 7 | 24,576 भुजाओं वाला बहुभुज |
| जमशीद अल-काशी | तैमूरी ईरान / समरकंद | 1424 ईस्वी | 16 | $3 \times 2^{28}$ भुजाओं वाला बहुभुज |
| लुडोल्फ वॉन सोइलेन | नीदरलैंड / यूरोप | 1596 ईस्वी | 20 / 35 | $2^{62}$ भुजाओं वाला बहुभुज |
अल-काशी बनाम साइमन स्टीविन: प्राथमिकता और प्रभाव
पश्चिमी विज्ञान के पारंपरिक इतिहास में दशमलव भिन्नों के आविष्कार का श्रेय प्रायः फ्लेमिश इंजीनियर और गणितज्ञ साइमन स्टीविन (Simon Stevin) को दिया जाता रहा है, जिन्होंने 1585 ईस्वी में लाइडेन में अपनी प्रसिद्ध लघु पुस्तिका 'द थींडे' (De Thiende - दसवाँ भाग) प्रकाशित की थी। स्टीविन ने यूरोपीय व्यापार और खगोलशास्त्र में दशमलव भिन्नों के व्यावहारिक उपयोग पर बल दिया। परंतु आधुनिक ऐतिहासिक अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि अल-काशी ने स्टीविन से लगभग 158 वर्ष पूर्व ही दशमलव भिन्नों की एक कहीं अधिक परिपक्व और गणितीय रूप से सुदृढ़ प्रणाली का निर्माण कर लिया था।
रोचक तथ्य यह है कि अंकन शैली (notation) के मामले में अल-काशी की पद्धति साइमन स्टीविन की पद्धति से कहीं अधिक सरल और आधुनिक प्रतीकात्मकता के निकट थी। स्टीविन प्रत्येक दशमलव स्थान के बाद एक वृत्त में उसकी घात लिखते थे (जैसे 25(0) 3(1) 7(2)), जो पढ़ने में जटिल और बोझिल थी। इसके विपरीत, अल-काशी ने केवल विभाजक रेखा या रंगीन स्याही का प्रयोग किया, जो जॉन नेपियर द्वारा 1617 ईस्वी में प्रस्तुत दशमलव बिंदु के अत्यंत निकट था।
यद्यपि इस बात के प्रत्यक्ष साक्ष्य सीमित हैं कि अल-काशी की पांडुलिपियाँ सीधे स्टीविन तक पहुँची थीं, तथापि 15वीं और 16वीं शताब्दी में वेनिस और कॉन्स्टेंटिनोपल (इस्तांबुल) के माध्यम से इस्लामी वैज्ञानिक ग्रंथों का निरंतर अनुवाद और प्रसार यूरोप में हो रहा था। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री जॉन ग्रीव्स (John Greaves) ने 1640 के दशक में समरकंद की खगोलीय सारणियों और अल-काशी के कार्यों की पांडुलिपियाँ इंग्लैंड लाकर उनका अनुवाद किया, जिससे यूरोपीय विद्वान अल-काशी की असाधारण गणितीय क्षमता से सीधे परिचित हुए।

समरकंद में खगोलीय अनुप्रयोग और त्रिकोणमितीय उपलब्धियाँ
अल-काशी का दशमलव भिन्नों का विकास केवल एक सैद्धांतिक कौतुक नहीं था, बल्कि यह उस युग की सबसे महत्वाकांक्षी खगोलीय परियोजना की अनिवार्य आवश्यकता थी। उलुग़ बेग के तत्वावधान में समरकंद वेधशाला में 'ज़िज-ए सुल्तानी' (Zij-i Sultani) नामक तारा-तालिका तैयार की जा रही थी। इस परियोजना के लिए 1000 से अधिक तारों की सटीक स्थिति और सौरमंडल के ग्रहों की गतियों की गणना करनी थी, जिसके लिए त्रिकोणमितीय अनुपातों के अत्यधिक सटीक मान आवश्यक थे।
अल-काशी ने 'अल-रिसाला अल-वतर व'ल-जैब' (The Treatise on the Chord and Sine) में $\sin(1^\circ)$ का मान अभूतपूर्व सटीकता से ज्ञात करने के लिए एक घन समीकरण (cubic equation) तैयार किया: $$4x^3 - 3x + \sin(3^\circ) = 0$$ चूँकि $\sin(3^\circ)$ का मान ज्यामितीय रूप से पहले से ज्ञात था, अल-काशी ने इस त्रिघात समीकरण को हल करने के लिए एक अद्वितीय संख्यात्मक पुनरावृत्ति विधि (numerical iteration method) का आविष्कार किया। यह विधि आधुनिक काल के 'फिक्स्ड-पॉइंट इटरेशन' (fixed-point iteration) और न्यूटन-राफसन विधि के सिद्धांतों के सदृश थी।
इस विधि के द्वारा उन्होंने $\sin(1^\circ)$ का मान षष्ट्यांश प्रणाली में चार स्थानों तक (दशमलव में 10 से अधिक शुद्ध स्थानों तक) निर्धारित किया। यह मान इतना सटीक था कि इसने 'ज़िज-ए सुल्तानी' की तालिकाओं को उस युग की दुनिया की सबसे विश्वसनीय खगोलीय मार्गदर्शिका बना दिया। दशमलव भिन्नों के संचालन के बिना इस स्तर की जटिल और विस्तृत गणनाओं को त्रुटिरहित बनाए रखना असंभव था। अल-काशी ने खगोलशास्त्रियों के लिए 'प्लेट ऑफ हेवन्स' (टबाक़ अल-मनातिक़) नामक एक एनालॉग कंप्यूटिंग उपकरण का भी आविष्कार किया, जो ग्रहों के देशांतरों की गणना यंत्रवत् कर सकता था।
ईरान के काशान नगर में जमशीद ग़ियाथ अल-दीन अल-काशी का जन्म हुआ।
अल-काशी द्वारा 1424 में निकाला गया पाई का मान आगामी 172 वर्षों तक मानव इतिहास में गणितीय शुद्धता का सर्वोच्च शिखर बना रहा।
'मिफ़्ताह अल-हिसाब' का उपयोग संपूर्ण मध्य पूर्व, उस्मानी साम्राज्य और भारत के मुग़ल मदरसों में 19वीं सदी तक एक मानक गणितीय पाठ्यपुस्तक के रूप में होता रहा।
अल-काशी ने त्रिघात समीकरणों को हल करने के लिए जो पुनरावृत्ति विधि अपनाई, वह 16वीं सदी के इतालवी गणितज्ञों (टार्टाग्लिया और कार्डानो) से पूर्णतः स्वतंत्र और अधिक प्रत्यक्ष थी।
उलुग़ बेग ने अपनी व्यक्तिगत डायरी और पत्रों में अल-काशी को 'अद्वितीय वैज्ञानिक और समस्याओं को क्षण भर में सुलझाने वाला प्रतिभाशाली मस्तिष्क' कहा था।
“मैंने संख्याओं के विज्ञान में इस ग्रंथ की रचना इस प्रकार की है कि इसमें प्राचीन विद्वानों के सारे सार समाहित हैं और इसमें ऐसे नियम जोड़े गए हैं जो पहले कभी लिपिबद्ध नहीं हुए थे; विशेषकर दशमलव भिन्नों की वह पद्धति जो गणना को अत्यंत सरल और त्रुटिहीन बना देती है।”
निष्कर्षतः, जमशीद अल-काशी मध्यकालीन वैज्ञानिक परंपरा और आधुनिक गणितीय विज्ञान के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण सेतु थे। दशमलव भिन्नों को एक एकीकृत, व्यावहारिक और सार्वभौमिक अंकगणितीय प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करके उन्होंने मानव सभ्यता की गणना-क्षमता को एक नई दिशा दी। आज जब हम दैनिक जीवन में दशमलव बिंदुओं का सहजता से प्रयोग करते हैं, तो हम अनजाने में उस फ़ारसी गणितीय परंपरा के ऋणी होते हैं जिसे काशान की गलियों से लेकर समरकंद के विशाल सेक्सटेंट तक जमशीद अल-काशी ने अपने अथक बौद्धिक श्रम से सींचा था।
References
- Encyclopaedia Iranica – Gīāṯ-al-Dīn Jamšīd Kāšānī
- MacTutor History of Mathematics – Ghiyath al-Din Jamshid Mas'ud al-Kashi
- UNESCO Courier – Ulugh Beg and the Samarkand Observatory
- Metropolitan Museum of Art – The Art and Science of the Timurid Period
- British Museum – Islamic Mathematics and Astronomy Instruments
- Stanford Encyclopedia of Philosophy – Mathematics in the Medieval Islamic World
Frequently asked questions
जमशीद अल-काशी कौन थे और उनका प्रमुख योगदान क्या है?
ग़ियाथ अल-दीन जमशीद मसूद अल-काशी (1380–1429 ईस्वी) एक फ़ारसी खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे, जो काशान से समरकंद गए। उनका सबसे प्रमुख योगदान दशमलव भिन्नों की व्यापक अंकगणितीय प्रणाली का विकास, पाई (π) की 16 दशमलव स्थानों तक की अभूतपूर्व गणना और घन समीकरणों को हल करने के लिए पुनरावृत्ति विधियों (iterative methods) का प्रतिपादन करना था।
दशमलव भिन्नों के विकास में अल-काशी का क्या स्थान है?
यद्यपि 10वीं शताब्दी में अल-उक़लीदीसी और 12वीं शताब्दी में अल-समवाल ने प्रारंभिक दशमलव विचारों की चर्चा की थी, परंतु अल-काशी ने पहली बार दशमलव भिन्नों को एक स्वतंत्र, सुसंगत और व्यावहारिक अंकगणितीय उपकरण का रूप दिया। उन्होंने पूर्णांकों और भिन्नों के लिए समान संक्रियात्मक नियमों को स्थापित किया और स्पष्ट विभाजक अंकन शैली प्रदान की।
अल-काशी ने पाई (π) का मान किस सटीकता तक निर्धारित किया था?
1424 ईस्वी में अपने ग्रंथ 'अल-रिसाला अल-मुहीतिया' (परिमिति संबंधी ग्रंथ) में अल-काशी ने वृत्त के व्यास और परिधि के संबंध का विश्लेषण करते हुए पाई ($2\pi$) का मान 16 दशमलव स्थानों तक सही निकाला: $2\pi \approx 6.2831853071795865$। यह गणना उस युग की सबसे सटीक गणना थी, जिसे लगभग दो शताब्दियों बाद यूरोप में लुडोल्फ वॉन सोइलेन ही पार कर सके।
क्या साइमन स्टीविन का कार्य अल-काशी के सिद्धांतों पर आधारित था?
अधिकांश आधुनिक विज्ञान इतिहासकार मानते हैं कि फ्लेमिश गणितज्ञ साइमन स्टीविन (1585 ईस्वी) ने संभवतः अल-काशी से स्वतंत्र रूप से दशमलव भिन्नों का विकास किया, यद्यपि दोनों प्रणालियों में गहरी संरचनात्मक समानताएँ थीं। फिर भी, अल-काशी का कार्य स्टीविन से डेढ़ सदी पहले अस्तित्व में आया था और अंकन व गणना की दृष्टि से कहीं अधिक परिष्कृत था।
अल-काशी की 'मिफ़्ताह अल-हिसाब' का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
'मिफ़्ताह अल-हिसाब' (The Key to Arithmetic, 1427 ईस्वी) मध्यकालीन इस्लामी जगत में अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिति और खगोलशास्त्र का एक विश्वकोशीय ग्रंथ था। यह ग्रंथ न केवल विद्वानों के लिए बल्कि व्यापारियों, वास्तुकारों और भूमि-सर्वेक्षकों के लिए एक व्यावहारिक निर्देशिका था, जिसने दशमलव प्रणाली के व्यावहारिक उपयोग को व्यापक बनाया।