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पारसी समुदाय: फारस से भारत तक की ऐतिहासिक यात्रा

सासानी साम्राज्य के पतन से संजान तट तक का पलायन, जोरास्ट्रियन विरासत और आधुनिक भारत के निर्माण में अप्रतिम योगदान

पारसी समुदाय का इतिहास प्राचीन फारस की समृद्ध जरथुstrियन (जोरास्ट्रियन) सभ्यता और मध्यकालीन भारत के आतिथ्य का अनुपम संगम है। सासानी साम्राज्य के पतन के बाद भारत आए इस सूक्ष्म अल्पसंख्यक समुदाय ने अपनी धार्मिक व सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण रखते हुए देश के औद्योगीकरण, विज्ञान, राजनीति और समाज-सुधार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

Key takeaways

  • सासानी साम्राज्य के अंतिम शासक यज़्दगर्द तृतीय की 651 ईस्वी में पराजय के बाद फारसी जोरास्ट्रियन धर्मावलंबियों ने खुरासान और होर्मुज के रास्ते भारत की ओर पलायन किया।
  • 16वीं शताब्दी के ग्रंथ 'किस्स-ए-संजान' के अनुसार, पारसियों ने गुजरात के स्थानीय हिंदू राजा जादी राणा के समक्ष दूध में चीनी का प्रतीकात्मक उदाहरण देकर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का वचन दिया था।
  • पारसी धर्म में पवित्र अग्नि (आतिश) को अहुर मज़्दा की पावन ज्योति माना जाता है; भारत में स्थापित सबसे प्राचीन एवं पवित्र आग्नेयालय उडवाड़ा का 'आतिश बेहराम' (इरंशाह) है।
  • भारत की कुल जनसंख्या का 0.005% से भी कम होने के बावजूद, पारसियों ने दादाभाई नौरोजी, जमशेदजी टाटा और होमी भाभा के नेतृत्व में भारत के स्वतंत्रता संग्राम, औद्योगिकीकरण तथा परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी।
  • मृत्यु उपरांत अंतिम संस्कार के लिए पारसी 'दोखमा' (टावर ऑफ साइलेंस) में शव को प्रकृति और गिद्धों को समर्पित करने की सौर-अपघटन परंपरा (दोखमेनाशिनी) का पालन करते हैं।
  • वर्तमान में घटती जन्मदर के कारण समुदाय गंभीर जनसांख्यिकीय संकट से जूझ रहा है, जिसके संरक्षण हेतु भारत सरकार ने 'जियो पारसी' योजना प्रारंभ की है।
An intricately carved ancient Persian bas-relief depicting Zoroastrian motifs from Persepolis, stone relief, c. 500 BCE, Iran.
Unknown · Public domain · Wikimedia Commons

पारसी भारत का एक अत्यंत विशिष्ट और ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली समुदाय है, जिसकी जड़ें प्राचीन फारस (वर्तमान ईरान) के सासानी साम्राज्य और जोरास्ट्रियन (जरथुश्त्रवादी) धर्म से गहराई से जुड़ी हुई हैं। लगभग एक हजार वर्षों से अधिक समय पूर्व, जब इस्लामी विजय के परिणामस्वरूप सासानी साम्राज्य का पराभव हुआ, तब अपने धार्मिक विश्वासों, पवित्र अग्नि और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए जोरास्ट्रियन शरणार्थियों का एक बड़ा समूह फारस की खाड़ी को पार करके भारत के पश्चिमी तट पर आया। भारतीय धरती पर शरण पाने वाले इन प्रवासियों को कालान्तर में उनके मूल देश 'पारस' (फारस) के नाम पर 'पारसी' कहा जाने लगा। संख्यात्मक दृष्टि से अत्यंत लघु होने के उपरांत भी, पारसी समुदाय ने अपनी निष्ठा, उद्यमशीलता, दानशीलता और बौद्धिक नेतृत्व के बल पर आधुनिक भारतीय राष्ट्र के आर्थिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक ताने-बाने को असाधारण रूप से समृद्ध किया है।

सासानी साम्राज्य का पराभव और फारस से निष्क्रमण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ईरानी पठार पर तीसरी शताब्दी ईस्वी से लेकर सातवीं शताब्दी के मध्य तक सासानी साम्राज्य (224-651 ईस्वी) का शासन रहा, जो प्राचीन विश्व की दो महानतम महाशक्तियों में से एक था। सासानी काल में जरथुश्त्र द्वारा प्रवर्तित जोरास्ट्रियन धर्म को राजधर्म का दर्जा प्राप्त था। साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, कानून, कला और सामाजिक संरचना अवेस्ता के धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित थी। इस सभ्यता का पतन तब आरंभ हुआ जब आंतरिक कलह, रोम (बीजान्टिन) के साथ दशकों तक चले विनाशकारी युद्धों और आर्थिक दुर्बलता ने सासानी राज्य को भीतर से खोखला कर दिया। 636 ईस्वी में अल-कादिसियाह के युद्ध और तत्पश्चात 642 ईस्वी में नेहावंद के निर्णायक युद्ध में नवोदित अरब-मुस्लिम सेनाओं ने सासानी सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया। 651 ईस्वी में अंतिम सासानी शाहंशाह यज़्दगर्द तृतीय की मर्व में हुई हत्या के साथ ही चार शताब्दियों पुराने सासानी साम्राज्य का विधिवत अंत हो गया।

साम्राज्य के पतन के बाद फारसी जोरास्ट्रियनों के समक्ष एक गहरा अस्तित्वपरक संकट खड़ा हो गया। हालांकि प्रारंभिक काल में अहले-किताब के तहत 'जिम्मी' का दर्जा देकर उनसे 'जज़िया' कर वसूला गया, किंतु कालांतर में सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक दबावों के कारण व्यापक स्तर पर धर्म-परिवर्तन होने लगे। अनेक भव्य आतिशकदहों (अग्नि मंदिरों) को मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया गया अथवा नष्ट कर दिया गया। जोरास्ट्रियन परंपरा के कट्टर निष्ठावान अनुयायी, जो अपनी पैतृक आस्था, पवित्र आवेस्ताई भाषा और आतिश (पवित्र अग्नि) को किसी भी मूल्य पर त्यागने को तैयार नहीं थे, उन्होंने दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में शरण ली। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, अनुयायियों का एक बड़ा वर्ग खुरासान के कोहिस्तान (पर्वतीय क्षेत्र) में लगभग एक शताब्दी तक छिपा रहा। जब वहाँ भी परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो गईं, तो वे फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित बंदरगाह 'होर्मुज' की ओर बढ़े, जहाँ से उन्होंने भारत के लिए समुद्री मार्ग से प्रस्थान करने की योजना बनाई।

Ruins of the monumental Taq Kasra arch at Ctesiphon, brick architecture, 6th century CE, Iraq.
टिसिफॉन स्थित ताक-ए-कसरा (मदाइन का मेहराब), जो प्राचीन सासानी साम्राज्य के वैभव और वास्तुशिल्प का सबसे प्रमुख प्रतीक अवशेष है।Unknown · Public domain

संजान का ऐतिहासिक पलायन और 'किस्स-ए-संजान' की गाथा

भारत में पारसियों के आगमन का सबसे प्रामाणिक पारंपरिक ऐतिहासिक वृत्तांत 1599 ईस्वी में बहराम इब्न फरहद्र संजाना द्वारा रचित फारसी काव्य 'किस्स-ए-संजान' (संजान की कथा) में मिलता है। इस ग्रंथ के अनुसार, होर्मुज से जहाजों में सवार होकर जोरास्ट्रियन शरणार्थी सर्वप्रथम काठियावाड़ प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित दीव द्वीप पर पहुँचे। दीव में लगभग उन्नीस वर्ष व्यतीत करने के उपरांत, अपने एक दूरदर्शी पुरोहित (दस्तूर) की ज्योतिषीय व आध्यात्मिक सलाह पर उन्होंने पुनः समुद्र यात्रा की और गुजरात के संजान (वर्तमान वलसाड जिला) के तट पर लंगर डाला। यहाँ का तत्कालीन शासक स्थानीय हिंदू राजा जादी राणा (जिन्हें इतिहासकार प्रायः शिलाहार वंश या राष्ट्रकूट सामंत के रूप में पहचानते हैं) था।

राजा जादी राणा ने पारसियों को भूमि और संरक्षण देने के बदले कुछ शर्तें रखीं, जिन्हें पारसियों ने पूर्ण निष्ठा से स्वीकार किया। इन शर्तों में शामिल था: स्थानीय गुजराती भाषा को अपनी बोलचाल की भाषा बनाना, महिलाओं द्वारा पारंपरिक भारतीय वेशभूषा (साड़ी) को अपनाना, सार्वजनिक स्थानों पर हथियार न ले जाना और विवाह समारोह केवल संध्याकाल में स्थानीय रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए आयोजित करना। इन शर्तों ने पारसियों के सांस्कृतिक अनुकूलन की नींव रखी। संजान में बसने के तुरंत बाद पारसियों ने राजा से अपनी सबसे पवित्र धरोहर—'आतिश बेहराम' (अग्नि मंदिर)—की स्थापना हेतु एक निर्जन भूमि खंड का अनुरोध किया। राजा की सहायता से 16 विभिन्न प्रकार की अग्नियों को शुद्ध करके संजान में पहली बार पवित्र अग्नि प्रतिष्ठित की गई, जिसे 'इरंशाह' (ईरान का राजा) नाम दिया गया।

फारस से भारत तक पारसी प्रवास के प्रमुख चरण
कालखंडस्थान / पड़ावऐतिहासिक घटनाक्रमधार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
651–750 ईस्वीखुरासान और कोहिस्तानसासानी पतन के बाद ईरान के पर्वतीय क्षेत्रों में शरणअवेस्ता ग्रंथों और पुरोहित परंपरा की गुप्त रक्षा
लगभग 760–775 ईस्वीहोर्मुज बंदरगाहफारस की खाड़ी के तटीय नगर में प्रवासभारत यात्रा हेतु समुद्री जहाजों का प्रबंध
लगभग 775–794 ईस्वीदीव द्वीप (गुजरात)काठियावाड़ के तट पर प्रारंभिक आगमन और 19 वर्ष निवासभारतीय भूगोल और जलवायु से प्रथम प्रत्यक्ष परिचय
795–936 ईस्वीसंजान बंदरगाहराजा जादी राणा द्वारा शरण; दूध-चीनी की संधिभारत में प्रथम आतिश बेहराम (इरंशाह) की स्थापना
1398–1465 ईस्वीबांसदा एवं बहारोत गुफाएंसुलतान महमूद बेगड़ा के सेनापति अलफ खान का संजान पर आक्रमणपवित्र अग्नि की रक्षा हेतु 12 वर्षों तक गुफाओं में निवास
1742 ईस्वी से अब तकउडवाड़ाइरंशाह अग्नि की स्थायी प्रतिष्ठाभारत में पारसियों का सर्वोच्च और निरंतर तीर्थस्थल

धार्मिक दर्शन, पवित्र आतिश और विशिष्ट अनुष्ठानिक परंपराएं

पारसी धर्म एक पूर्णतः एकेश्वरवादी धर्म है, जिसका मूल पैगंबर जरथुश्त्र (जोरास्टर) की शिक्षाओं पर आधारित है। पारसी एक सर्वोच्च, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ईश्वर 'अहुर मज़्दा' (ज्ञान के स्वामी) की उपासना करते हैं। इस दर्शन का मूल स्तंभ एक नैतिक त्रयी पर टिका है: 'हुमत' (सद्विचार), 'हूख्त' (सद्वचन), और 'हुवर्श्त' (सत्कर्म)। पारसी ब्रह्मांड को अच्छाई (स्पेंता मैन्यु) और बुराई (अंग्र मैन्यु या अह्रिमन) के मध्य चलने वाले एक निरंतर नैतिक संघर्ष के रूप में देखते हैं, जहाँ प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों द्वारा प्रकाश और सत्य (आशा) का पक्ष चुनना होता है।

पारसी उपासना पद्धति में अग्नि (आतिश) का केंद्रीय स्थान है। अग्नि को अहुर मज़्दा की ज्योति, सत्य और शुद्धता का भौतिक प्रकटीकरण माना जाता है। पारसी आग्नेयालयों को सामान्यतः 'अगियारी' या 'आतिश बेहराम' कहा जाता है। आतिश बेहराम की प्रतिष्ठा अत्यंत जटिल प्रक्रिया है, जिसमें श्मशान की चिता की अग्नि, लोहार, कुम्हार, सैनिक के चूल्हे और आकाशीय बिजली की आग सहित 16 अलग-अलग सांसारिक स्रोतों से अग्नि एकत्र की जाती है। महीनों तक चलने वाले शुद्धिकरण मंत्रों के बाद इसे वेदी पर स्थापित किया जाता है। एक बार स्थापित होने के बाद यह अग्नि कभी बुझाई नहीं जाती; पुजारी (मोबद) दिन के पांच प्रहरों (गेह) में चंदन और लोबान की आहुति देकर इसे निरंतर प्रज्वलित रखते हैं। गैर-पारसियों का अग्नि मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश वर्जित होता है ताकि अनुष्ठानिक शुद्धि बनी रहे।

नवजोत संस्कार और सामाजिक दीक्षा

पारसी बालक या बालिका को धर्म में विधिवत सम्मिलित करने हेतु 'नवजोत' (Navjote) संस्कार संपन्न किया जाता है, जो सामान्यतः 7 से 12 वर्ष की आयु के मध्य होता है। इस संस्कार में बच्चे को पवित्र सफेद मलमल का वस्त्र 'सुद्रेह' (Sudreh) और मेमने के ऊन से बुना गया पवित्र धागा 'कुश्ती' (Kusti) धारण कराया जाता है। सुद्रेह पवित्रता का प्रतीक है, जिसके आगे एक छोटी जेब (गिरेबान) होती है, जो मनुष्य को अपने जीवन में सत्कर्मों का संचय करने की याद दिलाती है। कुश्ती को कमर के चारों ओर तीन बार लपेटा जाता है, जो सद्विचार, सद्वचन और सत्कर्म के तीन बुनियादी सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता है। प्रत्येक पारसी दिन में कई बार प्रार्थना करते हुए कुश्ती को खोलकर पुनः बांधता है।

दोखमेनाशिनी: अंतिम संस्कार की अनूठी पारिस्थितिक प्रणाली

पारसी समुदाय का अंतिम संस्कार विश्व की सबसे प्राचीन और अनूठी पारिस्थितिक परंपराओं में गिना जाता है, जिसे 'दोखमेनाशिनी' कहा जाता है। पारसी धर्म में प्रकृति के चार मूल तत्वों—अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी—को अत्यंत पावन माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार, आत्मा के शरीर से निकल जाने के बाद मृत देह को अपवित्र (नसु) माना जाता है। यदि मृत देह को जलाया जाए, तो अग्नि अपवित्र होगी; यदि भूमि में दफनाया जाए, तो पृथ्वी अपवित्र होगी; और यदि जल में प्रवाहित किया जाए, तो जल दूषित होगा। अतएव, पारसी अपने मृतकों को खुले गोलाकार पत्थरों के ऊंचे ढांचों में रखते हैं, जिन्हें 'दोखमा' या 'टावर ऑफ साइलेंस' (शांत मीनार) कहा जाता है।

दोखमा के भीतर शव को सूर्य के प्रकाश और मांसाहारी पक्षियों (विशेष रूप से गिद्धों) के समक्ष छोड़ दिया जाता है। पक्षी कुछ ही घंटों में मांस खा लेते हैं, और शेष बची अस्थियाँ सूर्य की प्रखर किरणों से सूखकर जीवाणुरहित हो जाती हैं। बाद में इन हड्डियों को मीनार के मध्य स्थित एक गहरे कुएं (अस्तोधन) में डाल दिया जाता है, जहाँ वे चारकोल और रेत की परतों से छनकर धीरे-धीरे मिट्टी में विलीन हो जाती हैं। यह प्रणाली सामाजिक समता का भी उदाहरण है, जहाँ धनी और निर्धन दोनों के अवशेष एक ही कुएं में मिलकर एकाकार हो जाते हैं। यद्यपि आधुनिक काल में भारत में गिद्धों की घटती संख्या ने इस परंपरा के समक्ष गंभीर व्यावहारिक संकट उत्पन्न किए हैं, जिसके समाधान हेतु मुंबई आदि स्थानों पर सौर-परावर्तक यंत्र लगाए गए हैं।

आधुनिक भारत के निर्माण में पारसियों का अप्रतिम योगदान

17वीं और 18वीं शताब्दी में जब यूरोपीय शक्तियाँ (पुर्तगाली, डच और ब्रिटिश) भारत आईं, तो पारसी समुदाय अपनी निष्पक्षता, व्यापारिक ईमानदारी और बहुभाषी दक्षता के कारण व्यापार और मध्यस्थता के केंद्र में आ गया। जब 1668 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बॉम्बे (मुंबई) का नियंत्रण प्राप्त किया, तो पारसियों ने संजान, सूरत और भरूच से बॉम्बे की ओर पलायन किया। उन्होंने बॉम्बे को भारत की वाणिज्यिक राजधानी के रूप में विकसित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। जहाजरानी, कपड़ा मिलों, विदेशी व्यापार और वित्तीय संस्थानों की स्थापना करके पारसी परिवारों ने 19वीं सदी के भारतीय पुनर्जागरण का नेतृत्व किया।

  • राजनीति और स्वतंत्रता आंदोलन: दादाभाई नौरोजी ('भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन') ने 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' सिद्धांत का प्रतिपादन किया और 1892 में ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) के पहले भारतीय सदस्य बने। फिरोजशाह मेहता और दिनशा वाचा ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और प्रारंभिक दिशा तय करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। मैडम भीकाजी कामा ने 1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में पहली बार विदेशी धरती पर भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज फहराया।
  • उद्योग और अर्थव्यवस्था: जमशेदजी नसरवानजी टाटा को 'भारतीय उद्योग का जनक' कहा जाता है। उन्होंने जमशेदपुर में भारत के पहले एकीकृत इस्पात संयंत्र (टिस्को) की स्थापना की, मुंबई में ताजमहल पैलेस होटल बनवाया, और जलविद्युत परियोजनाओं की शुरुआत की। गोदरेज समूह के अर्देशिर गोदरेज और पिरोजशा गोदरेज ने स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देकर भारत को ताले, तिजोरी और साबुन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया। वाडिया परिवार ने बॉम्बे डॉकयार्ड्स में ऐतिहासिक युद्धपोतों का निर्माण किया।
  • विज्ञान, अनुसंधान और उच्च शिक्षा: जमशेदजी टाटा की दूरदृष्टि से बेंगलुरु में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) की स्थापना हुई। परमाणु भौतिक विज्ञानी डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने भारत के त्रि-स्तरीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) तथा भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) की स्थापना की।
  • सैन्य पराक्रम और न्यायपालिका: फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ (सैम बहादुर) ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना का ऐतिहासिक नेतृत्व किया, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ। नानी पालखीवाला ने 'केशवानंद भारती' मामले में मौलिक अधिकारों और संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत की ऐतिहासिक रक्षा की। फ़ली एस. नरीमन ने भारत के शीर्ष न्यायविदों में स्थान बनाया।
  • कला, साहित्य और संगीत: पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के विश्वविख्यात संचालक जुबिन मेहता ने वैश्विक मंचों पर भारत का नाम रोशन किया, जबकि चित्रकला में जहांगीर सबावाला ने आधुनिक भारतीय कला को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं।
भारत में पारसी जनसंख्या का जनसांख्यिकीय ह्रास (1941–2011)(व्यक्ति)
1941114,8901961100,772198171,630200169,601201157,264

समकालीन चुनौतियाँ और 'जियो पारसी' संरक्षण अभियान

इतने गौरवशाली इतिहास और उपलब्धियों के बावजूद, आज पारसी समुदाय अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर जनसांख्यिकीय संकट का सामना कर रहा है। 1941 की जनगणना में भारत में पारसियों की संख्या लगभग 1,15,000 थी, जो 2011 की जनगणना में घटकर मात्र 57,264 रह गई। जनसांख्यिकी विशेषज्ञों के अनुसार, पारसी समुदाय की प्रजनन दर प्रति महिला लगभग 0.8 है, जो कि जनसंख्या प्रतिस्थापन की आवश्यक दर (2.1) से अत्यधिक नीचे है। समुदाय में 30% से अधिक आबादी 60 वर्ष से अधिक आयु की है, और जन्म दर की तुलना में मृत्यु दर लगभग तिगुनी है।

इस जनसंख्या ह्रास के मुख्य कारणों में देर से विवाह करना, विवाह न करने की बढ़ती प्रवृत्ति, उच्च शिक्षा व करियर की प्राथमिकता, विदेशों (कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया) में व्यापक उत्प्रवास, और समुदाय के कड़े सामाजिक नियम शामिल हैं। पारंपरिक पारसी व्यक्तिगत कानून के तहत, यदि कोई पारसी महिला किसी गैर-पारसी पुरुष से विवाह करती है, तो उसकी संतानों को पारसी धार्मिक समुदाय और अग्नि मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं मिलता, हालांकि पारसी पुरुषों के गैर-पारसी महिलाओं से विवाह के मामले में नियम कुछ अधिक लचीले रहे हैं। इस रूढ़िवादिता को लेकर समुदाय के भीतर सुधारवादी और रूढ़िवादी वर्गों के मध्य तीखी बहस चल रही है।

इस संकट के समाधान के लिए भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने 2013-14 में 'जियो पारसी' (Jiyo Parsi) नामक एक अनूठी केंद्रीय योजना का शुभारंभ किया। इस योजना के अंतर्गत पारसी दंपतियों को आधुनिक प्रजनन तकनीकों (ART/IVF) के लिए वित्तीय सहायता, विवाह परामर्श, और बाल देखभाल सहायता प्रदान की जाती है। इस योजना के माध्यम से अब तक सैकड़ों बच्चों का जन्म हुआ है, जिससे समुदाय की लुप्तप्राय होती आबादी को एक नई आशा की किरण मिली है। इसके अतिरिक्त, 'परज़ोर' (Parzor) फाउंडेशन जैसी संस्थाएं यूनेस्को के सहयोग से पारसी पांडुलिपियों, वस्त्रों, संगीत और मौखिक इतिहास के डिजिटलीकरण और संरक्षण में जुटी हुई हैं।

  1. शाहंशाह यज़्दगर्द तृतीय की मृत्यु के साथ प्राचीन फारसी साम्राज्य का अंत हुआ और जोरास्ट्रियनों का उत्पीड़न शुरू हुआ।

“पारसियों ने जिस देश में शरण ली, उसे अपनी मातृभूमि मानकर अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उनकी निष्ठा, परिश्रम और चरित्र की शुद्धता ने सिद्ध किया कि एक सूक्ष्म अल्पसंख्यक भी किसी राष्ट्र के भाग्य का निर्माता बन सकता है।”
— महात्मा गांधी, 'यंग इंडिया' (1924)

References

Frequently asked questions

पारसी कौन हैं और उनका मूल इतिहास क्या है?

पारसी वे लोग हैं जिनके पूर्वज प्राचीन फारस (आधुनिक ईरान) के जोरास्ट्रियन (जरथुश्त्रवादी) अनुयायी थे। 7वीं शताब्दी में अरब-इस्लामी विजय और सासानी साम्राज्य के पतन के बाद, अपने धर्म, संस्कृति और पवित्र अग्नि की रक्षा हेतु इन लोगों ने भारत के पश्चिमी तट (गुजरात) की ओर शरण ली। भारत में बसने के बाद उन्हें उनके मूल देश 'पारस' (फारस) के आधार पर 'पारसी' कहा जाने लगा।

पारसी समुदाय सबसे पहले भारत में कहाँ और कब पहुँचा?

ऐतिहासिक ग्रंथ 'किस्स-ए-संजान' के अनुसार, पारसी शरणार्थी 8वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य (विद्वानों के अनुसार लगभग 716 ईस्वी या 936 ईस्वी) गुजरात के संजान बंदरगाह पर पहुँचे। इससे पूर्व वे कुछ समय तक काठियावाड़ के दीव द्वीप पर भी रहे थे। संजान के शिलाहार या यादव वंशीय स्थानीय शासक जादी राणा ने उन्हें कुछ सांस्कृतिक व सामाजिक शर्तों के साथ वहाँ बसने की अनुमति दी थी।

दूध में चीनी की प्रसिद्ध पारसी कथा क्या है?

जब पारसी संजान पहुँचे, तो स्थानीय राजा जादी राणा ने उनके सामने लबालब भरा हुआ दूध का एक कटोरा भेजा, जिसका सांकेतिक अर्थ था कि उनका राज्य पहले से ही पूरी तरह भरा हुआ है और नए प्रवासियों के लिए जगह नहीं है। पारसी दस्तूर (मुख्य पुरोहित) ने उस भरे हुए दूध में एक चम्मच चीनी घोल दी, जिससे दूध बाहर छलके बिना मीठा हो गया। इसका भाव यह था कि पारसी स्थानीय समाज में बिना किसी उपद्रव या व्यवधान के घुलमिल जाएंगे और उसे समृद्ध करेंगे।

पारसी धर्म में पवित्र अग्नि (आतिश बेहराम) का क्या महत्व है?

जोरास्ट्रियन धर्म में अग्नि (आतिश) को सर्वोच्च ईश्वर 'अहुर मज़्दा' का प्रत्यक्ष, शुद्ध और पवित्र प्रतीक माना जाता है। पारसी अग्नि की पूजा नहीं करते, बल्कि अग्नि को ईश्वर की उपस्थिति का माध्यम मानकर उसके सम्मुख प्रार्थना करते हैं। आतिश बेहराम पारसियों का सर्वोच्च श्रेणी का अग्नि मंदिर होता है, जिसमें 16 विभिन्न स्रोतों से लाई गई अग्नि को जटिल वैदिक-समान अनुष्ठानों द्वारा शुद्ध करके प्रतिष्ठित किया जाता है। गुजरात के उडवाड़ा का 'इरंशाह आतिश बेहराम' भारत का सबसे प्राचीन निरंतर प्रज्वलित अग्नि मंदिर है।

पारसी अंतिम संस्कार के लिए टावर ऑफ साइलेंस (दोखमा) का उपयोग क्यों करते हैं?

जोरास्ट्रियन धर्मशास्त्र के अनुसार, पृथ्वी, जल और अग्नि तीनों ईश्वर द्वारा रचित पवित्र तत्व हैं, जिन्हें किसी मृत शरीर (नसु) से दूषित नहीं किया जाना चाहिए। शवदाह से अग्नि और दफनाने से भूमि अपवित्र होती है। इसलिए, पारसी अपने मृतकों को 'दोखमा' (Tower of Silence) नामक एक खुली गोलाकार संरचना में रखते हैं, जहाँ सूर्य की किरणों और मांसाहारी पक्षियों (विशेषकर गिद्धों) द्वारा शरीर का स्वाभाविक अंत होता है। इसे 'दोखमेनाशिनी' कहा जाता है।

भारत के विकास में पारसी समुदाय का क्या योगदान रहा है?

संख्यात्मक रूप से अत्यंत सूक्ष्म होने के बावजूद पारसी समुदाय ने आधुनिक भारत की नींव रखने में अतुलनीय भूमिका निभाई है। दादाभाई नौरोजी ने धन की निकासी का सिद्धांत दिया और 'स्वराज' शब्द को राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बनाया। जमशेदजी टाटा ने भारतीय इस्पात उद्योग, जलविद्युत और विज्ञान संस्थान (IISc) की स्थापना की। डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का नेतृत्व किया, और फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने 1971 के युद्ध में भारत को ऐतिहासिक सैन्य विजय दिलाई।