ईरान में एशियाई चीता: पारिस्थितिकी, ऐतिहासिक परिदृश्य और संरक्षण की चुनौतियाँ
विलुप्ति की कगार पर खड़े 'यूरेशियाई चीते' की अंतिम शरणस्थली और उसके अस्तित्व की वैज्ञानिक पड़ताल
यह शोधपरक लेख ईरान के शुष्क पठार में जीवित अंतिम एशियाई चीतों (एसिनोनिक्स जुबेटस वेनेटिकस) की जैव-पारिस्थितिकी, ऐतिहासिक विस्तार और वर्तमान संकट की समीक्षा करता है। पर्यावास विखंडन, शिकार आधार की कमी और सड़क दुर्घटनाओं के बीच वैश्विक एवं राष्ट्रीय संरक्षण प्रयासों के वैज्ञानिक आयामों का गहन विश्लेषण यहाँ प्रस्तुत है।
Key takeaways
- एशियाई चीता (Acinonyx jubatus venaticus) आईयूसीएन की लाल सूची में अति संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में दर्ज है।
- ईरान का दश्त-ए कवीर और तूरान बायोस्फीयर रिजर्व इस दुर्लभ उपप्रजाति की विश्व में अंतिम प्राकृतिक प्रजनन स्थली है।
- ऐतिहासिक रूप से यह उपप्रजाति मेसोपोटामिया, ट्रांस-काकेशस, फारस, मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप तक फैली हुई थी।
- शिकार के आधार में कमी, राजमार्ग दुर्घटनाएं और चरवाहा कुत्तों के आक्रमण इस प्रजाति के अस्तित्व पर मंडराते सबसे घातक खतरे हैं।
- ईरान का पर्यावरण विभाग (DoE) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) 2001 से विशेष संरक्षण परियोजना (CACP) संचालित कर रहे हैं।

एशियाई चीता (Acinonyx jubatus venaticus) मार्जार कुल (Felidae) की एक अत्यंत संकटापन्न उपप्रजाति है, जो ऐतिहासिक रूप से संपूर्ण दक्षिण-पश्चिम एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में विस्तृत थी, किंतु वर्तमान में यह केवल ईरान के केंद्रीय पठार तक सीमित हो चुकी है। पारिस्थितिक दृष्टि से यह शुष्क मरुस्थलीय और अर्ध-शुष्क स्टेपी पारितंत्र का शीर्ष शिकारी (apex predator) है, जिसकी उपस्थिति संपूर्ण खाद्य-श्रृंखला के स्थायित्व और क्षेत्रीय जैव विविधता के स्वास्थ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण मानी जाती है। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक चले अनियंत्रित शिकार, पर्यावास विनाश और मानव अतिक्रमण के कारण यह उपप्रजाति अपने ऐतिहासिक विस्तार क्षेत्र के 98 प्रतिशत से अधिक भूभाग से लुप्त हो चुकी है, जिसके चलते वर्तमान में ईरान इसका अंतिम वैश्विक आश्रय स्थल बना हुआ है।
वर्गीकरण, रूपात्मक विशेषताएं और ऐतिहासिक फैलाव
आधुनिक आणविक आनुवंशिकी अध्ययनों, विशेष रूप से माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए अनुक्रमण से यह सिद्ध हुआ है कि एशियाई चीता अफ्रीकी उपप्रजातियों से लगभग 32,000 से 67,000 वर्ष पूर्व अलग हो गया था। यह सुदूर विचलन इसे एक स्वतंत्र संरक्षण इकाई (Evolutionarily Significant Unit) के रूप में स्थापित करता है। रूपात्मक रूप से, ईरानी पठार की चरम जलवायु परिस्थितियों के अनुकूलन के परिणामस्वरूप यह अपने अफ्रीकी समकक्षों की तुलना में विशिष्ट लक्षण प्रदर्शित करता है। इसका शरीर अपेक्षाकृत अधिक गठीला होता है, पैर थोड़े छोटे परंतु सुदृढ़ होते हैं, और इसकी खोपड़ी अधिक ठोस संरचना वाली होती है।
शीत ऋतु में जब ईरानी पठार का तापमान शून्य से काफी नीचे चला जाता है, तब एशियाई चीते के शरीर पर घने और अपेक्षाकृत लंबे बाल उग आते हैं, तथा ग्रीवा के पीछे एक सुस्पष्ट अयाल (mane) उभर आती है। इसके फर का आधार रंग हल्का बादामी-पीला अथवा गेहुंआ होता है, जिस पर ठोस काले गोल धब्बों का विन्यास अफ्रीकी चीतों की तुलना में थोड़ा विरल दिखाई देता है। चेहरे पर नासिका के दोनों कोनों से आंखों तक जाने वाली विशिष्ट अश्रु-रेखाएं (tear stripes) सूर्य के तीक्ष्ण परावर्तन को कम करने में सहायता करती हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से इस उपप्रजाति का भौगोलिक विस्तार विस्मयकारी था। प्राचीन फारसी साहित्य, मुग़लकालीन चित्रों और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार यह जीव अरब प्रायद्वीप, सीरिया, इराक, ट्रांस-काकेशस, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के गंगा के मैदानी इलाकों से लेकर दक्कन के पठार तक पाया जाता था। फारस के ससैनियन और सफ़विद दरबारों में चीतों को प्रशिक्षित कर हिरणों के आखेट के लिए उपयोग में लाया जाता था, जिसे 'यूज़' (Yuz) कहा जाता था। किंतु उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में आग्नेयास्त्रों के आगमन, व्यापक आखेट और वन विनाश ने मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया से इस शानदार जीव का नामोनिशान मिटा दिया। भारत में 1947 में इसके अंतिम ज्ञात व्यक्तियों के आखेट के पश्चात 1952 में इसे आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिया गया, जिसके बाद केवल ईरानी आबादी ही शेष बची।
ईरान में वर्तमान भौगोलिक वितरण और पर्यावास
वर्तमान समय में एशियाई चीते की उपस्थिति ईरान के विशाल केंद्रीय रेगिस्तान—दश्त-ए कवीर (Dasht-e Kavir) और उससे सटे पठारी परिदृश्यों में खंडित टुकड़ों के रूप में दर्ज की गई है। यह क्षेत्र अत्यधिक शुष्कता, विरल वनस्पति और विषम भू-आकृतिक संरचना (जैसे गहरी खड्डें, सूखी नदी घाटियां और पथरीली पहाड़ियाँ) से चिह्नित है। चीते विशेष रूप से ऐसे भूभागों को प्राथमिकता देते हैं जहां खुले मैदान शिकार को दौड़ाने के लिए उपयुक्त हों और समीपवर्ती पहाड़ियाँ शिकारियों से छिपने व ताक लगाने हेतु आश्रय प्रदान करती हों।
- तूरान बायोस्फीयर रिजर्व (Touran Biosphere Reserve): सेमनान प्रांत में स्थित यह क्षेत्र 1.4 मिलियन हेक्टेयर में फैला है और वर्तमान में एशियाई चीते की सबसे महत्वपूर्ण एवं व्यवहार्य प्रजनन आबादी का पोषण करता है।
- मियानदश्त वन्यजीव अभयारण्य (Miandasht Wildlife Refuge): उत्तरी खोरासान में स्थित यह अर्ध-मरुस्थलीय स्टेपी क्षेत्र फारसी गज़ेल (Gazella subgutturosa) की प्रचुरता के कारण चीतों के लिए एक महत्वपूर्ण शीतकालीन पर्यावास सिद्ध हुआ है।
- कवीर राष्ट्रीय उद्यान (Kavir National Park): ऐतिहासिक रूप से चीतों का प्रमुख केंद्र रहा यह विशाल संरक्षित क्षेत्र अब विरल अवलोकनों के साथ एक महत्वपूर्ण संभावित पुनर्प्राप्ति स्थल माना जाता है।
- दर्रेह अंजीर वन्यजीव अभयारण्य (Dareh Anjir Wildlife Refuge): यज़्द प्रांत का यह दुर्गम और अत्यधिक शुष्क अभयारण्य दक्षिणी ईरानी आबादी के लिए महत्वपूर्ण आश्रय प्रदान करता है।
- नायबंदन वन्यजीव अभयारण्य (Naybandan Wildlife Refuge): दक्षिण खोरासान में स्थित यह ईरान का सबसे बड़ा वन्यजीव अभयारण्य है, जो चीते और उसके शिकारों के लिए विस्तृत एवं शांत क्षेत्र प्रदान करता है।
आहार, पारिस्थितिकी और अंतर-प्रजातीय गतिशीलता
ईरानी पारिस्थितिकी तंत्र में एशियाई चीता एक विशिष्ट परभक्षी है जिसका मुख्य आहार मध्यम आकार के अनगुलेट्स (खुरदार शाकाहारी जीव) हैं। चीते की आहार संरचना मुख्य रूप से चार प्रमुख प्रजातियों पर निर्भर करती है: गोइट्रेड गज़ेल (Gazella subgutturosa), भारतीय गज़ेल या चिंकारा (Gazella bennettii), जंगली भेड़ या उरियाल (Ovis orientalis), और जंगली बकरी या आइबेक्स (Capra aegagrus)। मैदानी इलाकों में गज़ेल इसका प्राथमिक शिकार बनते हैं, जबकि पथरीली पहाड़ियों के ढलानों पर यह जंगली भेड़ों और उनके मेमनों का कुशलतापूर्वक शिकार करता है।
चीता एक दृश्य शिकारी (visual hunter) है जो मुख्य रूप से भोर और गोधूलि वेला में सक्रिय रहता है। अपनी अद्वितीय गति, जो 100 किमी प्रति घंटा तक पहुंच सकती है, का उपयोग यह 300 से 400 मीटर के संक्षिप्त घेरे में शिकार को पकड़ने के लिए करता है। हालांकि, ईरान के कठोर मरुस्थलीय वातावरण में अत्यधिक ऊर्जा व्यय से बचने के लिए यह अक्सर भू-आकृतियों की ओट लेकर शिकार के अत्यधिक निकट पहुँचने का प्रयास करता है।
| शिकार प्रजाति | वैज्ञानिक नाम | प्राथमिक पर्यावास | चीते के आहार में महत्व |
|---|---|---|---|
| गोइट्रेड गज़ेल | Gazella subgutturosa | खुले मरुस्थलीय मैदान और स्टेपी | अति उच्च (मैदानी क्षेत्रों में मुख्य शिकार) |
| चिंकारा (भारतीय गज़ेल) | Gazella bennettii | शुष्क बजरीदार मैदान और खड्डें | उच्च (मध्य एवं दक्षिणी ईरान) |
| जंगली भेड़ (उरियाल) | Ovis orientalis | पहाड़ी ढलान और रोलिंग हिल्स | अति उच्च (पर्वतीय तलहटी में प्रमुख) |
| जंगली बकरी (आइबेक्स) | Capra aegagrus | खड़ी चट्टानी पहाड़ियाँ | मध्यम (अवसरवादी शिकार) |
| केप हरे (जंगली खरगोश) | Lepus capensis | झाड़ीदार मैदान | पूरक आहार (विशेषतः शावकों हेतु) |
ईरान के पारिस्थितिक तंत्र में एशियाई चीते को अन्य मांसाहारी जीवों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। फारसी तेंदुआ (Panthera pardus tulliana), धारीदार लकड़बग्घा (Hyaena hyaena) और भेड़िया (Canis lupus) इसके मुख्य प्रतिस्पर्धी हैं। तेंदुआ जहाँ भारी और चट्टानी क्षेत्रों पर प्रभुत्व रखता है, वहीं चीता अपनी गति के कारण खुले स्थानों में प्रभावी रहता है। किंतु भोजन की कमी होने पर भेड़िये और तेंदुए चीते द्वारा किए गए शिकार को छीन लेते हैं (kleptoparasitism) और कई अवसरों पर चीते के शावकों पर जानलेवा हमला भी करते हैं।
अस्तित्व के संकट: मानवजनित दबाव और पारिस्थितिक बाधाएं
एशियाई चीता वर्तमान में विलुप्ति के कगार पर जिन कारणों से पहुँचा है, वे लगभग पूर्णतः मानवजनित हैं। पिछली आधी सदी में हुए औद्योगिकीकरण, सड़कों के विस्तार, अनियंत्रित पशुचारण और अवैध शिकार ने इसके नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है।
पहला और सबसे घातक संकट शिकार प्रजातियों का ह्रास है। स्थानीय समुदायों द्वारा अत्यधिक अवैध शिकार (poaching) और अनियंत्रित पशुचारण के कारण चरागाहों के क्षरण ने गज़ेल और जंगली भेड़ों की संख्या में भारी गिरावट ला दी। जब शिकार का घनत्व एक सीमा से नीचे गिर जाता है, तो चीतों के लिए अपने शावकों का भरण-पोषण करना असंभव हो जाता है, जिससे उनकी प्रजनन सफलता दर शून्य के करीब पहुँच जाती है।

दूसरा प्रत्यक्ष संकट राजमार्ग और बुनियादी ढांचे का विकास है। विशेष रूप से तेहरान को पवित्र शहर मशहद से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 तूरान संरक्षित क्षेत्र के ठीक उत्तर से गुजरता है। यह व्यस्ततम सड़क मार्ग चीतों के पारंपरिक प्रवास मार्गों को काटता है। वर्ष 2004 से 2023 के बीच कम से कम 20 एशियाई चीते इस खंड पर वाहनों की चपेट में आकर मारे गए हैं, जिनमें से कई वयस्क प्रजननक्षम मादाएं थीं। एक ऐसी आबादी के लिए जहां कुल संख्या 40 से कम हो, प्रत्येक वयस्क मादा की मृत्यु संपूर्ण उपप्रजाति के विनाश की गति को कई गुना बढ़ा देती है।
तीसरा गंभीर खतरा पारंपरिक पशुचारण और चरवाहा शिकारी कुत्तों (pastoralist guard dogs) का प्रकोप है। सर्दियों और वसंत के मौसम में जब चरवाहे अपने विशाल रेवड़ों के साथ संरक्षित क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं, तो उनके आक्रामक कुत्ते न केवल युवा चीतों पर हमला कर उन्हें मार डालते हैं, बल्कि चीतों को उनके शिकार से भी खदेड़ देते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ क्षेत्रों में चरवाहों द्वारा अपने पशुओं की रक्षा के लिए ज़हरीले चारे का उपयोग किया जाता है, जो चीतों के लिए घातक सिद्ध होता है।
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण रणनीतियाँ
इस उपप्रजाति के आसन्न विलोपन को रोकने के लिए वर्ष 2001 में एक युगांतरकारी कदम उठाया गया। ईरानी पर्यावरण विभाग (Department of Environment - DoE) ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) के सहयोग से 'कंजर्वेशन ऑफ द एशियाटिक चीता प्रोजेक्ट' (CACP) की स्थापना की। इस परियोजना ने ईरानी चीता संरक्षण को एक संगठित और वैज्ञानिक ढांचा प्रदान किया।
सीएसीपी और स्वतंत्र अनुसंधान संगठनों जैसे 'ईरानी चीता सोसायटी' (Iranian Cheetah Society - ICS) तथा अंतरराष्ट्रीय संस्था 'पैंथेरा' (Panthera) के प्रयासों से कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए। संरक्षित क्षेत्रों में रेंजरों (गार्डबानों) की संख्या बढ़ाई गई, उन्हें उन्नत मोटरसाइकिलें, जीपीएस और स्वचालित कैमरा ट्रैप प्रदान किए गए। कैमरा ट्रैपिंग अभियानों के माध्यम से व्यक्तिगत चीतों की पहचान उनके शरीर के अनूठे धब्बों के विन्यास के आधार पर की गई, जिससे उनकी जनसंख्या गतिशीलता और स्थानिक गतिविधियों का सटीक डाटाबेस तैयार हुआ।
भारत सरकार ने आधिकारिक रूप से एशियाई चीते को भारतीय उपमहाद्वीप से विलुप्त घोषित किया।
सीएसीपी के अंतर्गत स्थानीय समुदायों के साथ सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए। तूरान और मियानदश्त के निकटवर्ती गांवों में चरवाहों को पशुधन क्षति के बदले आर्थिक मुआवजा देने की व्यवस्था की गई ताकि प्रतिशोधात्मक हत्याओं (retaliatory killings) को रोका जा सके। इसके अतिरिक्त, राजमार्गों पर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए गति सीमाएं निर्धारित की गईं, चेतावनी बोर्ड लगाए गए और सबसे संवेदनशील गलियारों पर वन्यजीव अंडरपास और बाड़बंदी के प्रस्तावों को आंशिक रूप से लागू किया गया।
एक्स-सीटू (Ex-situ) संरक्षण और कृत्रिम प्रजनन के प्रयास
जब किसी जंगली प्रजाति की संख्या 50 से नीचे गिर जाती है, तो इन-सीटू (प्राकृतिक वास में) संरक्षण के साथ-साथ एक्स-सीटू (बंदी प्रजनन) संरक्षण अनिवार्य हो जाता है। ईरान में तेहरान के परदीसन पार्क और बाद में तूरान राष्ट्रीय उद्यान में विशेष अनुसंधान एवं बंदी प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए। यहाँ 'कुशकी' (नर) और 'देलबार' (मादा) नामक दो बचाए गए चीतों को वर्षों तक रखकर प्राकृतिक और कृत्रिम गर्भाधान के प्रयास किए गए, यद्यपि प्रारंभिक वर्षों में सफलता सीमित रही।
मई 2022 में तूरान प्रजनन केंद्र में एक ऐतिहासिक घटना घटी जब बंदी मादा चीता 'ईरान' ने शल्यक्रिया (सिजेरियन सेक्शन) के माध्यम से तीन नर शावकों को जन्म दिया। दुर्भाग्यवश, अनुपयुक्त प्रारंभिक देखभाल और मां द्वारा अस्वीकृति के कारण दो शावकों की शीघ्र ही मृत्यु हो गई। जीवित बचे तीसरे शावक, जिसका नाम 'पिरोज़' (अर्थात 'विजेता') रखा गया, का पालन-पोषण मानव देखरेख में तेहरान में किया गया। पिरोज़ ईरानी जनता के लिए राष्ट्रीय गौरव, आशा और पर्यावरणीय चेतना का एक अभूतपूर्व प्रतीक बन गया। किंतु फरवरी 2023 में 10 माह की आयु में गंभीर गुर्दा रोग के कारण पिरोज़ की मृत्यु हो गई, जिसने कृत्रिम प्रजनन के वैज्ञानिक प्रबंधन और जैव-सुरक्षा प्रोटोकॉल पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े किए।
एशियाई चीते को वैज्ञानिक रूप से 'Acinonyx jubatus venaticus' कहा जाता है; 'वेनेटिकस' लैटिन भाषा से लिया गया शब्द है जिसका अर्थ 'शिकारी' होता है।
यह उपप्रजाति भी चीते की गति की अद्वितीय क्षमता साझा करती है और मात्र तीन सेकंड में शून्य से 90 किमी प्रति घंटे की गति प्राप्त कर सकती है।
एशियाई चीतों में अत्यधिक कम आनुवंशिक विविधता पाई जाती है, जिससे इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होती है और प्रजनन समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
ईरान में चीता केवल एक वन्यजीव नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बन चुका है, जिसे डाक टिकटों और खेलों में प्रमुखता मिली है।
“एशियाई चीते का बचना केवल एक उपप्रजाति के जीवित रहने का प्रश्न नहीं है; यह संपूर्ण यूरेशियाई शुष्क पारिस्थितिकी तंत्र की आत्मा को बचाने का अंतिम संघर्ष है।”
भावी दिशा और संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकताएं
एशियाई चीते को पूर्ण विलुप्ति से बचाने के लिए समय तेजी से समाप्त हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रशासनिक घोषणाओं से इस उपप्रजाति का अस्तित्व सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इसके लिए कुछ अत्यंत कठोर और वैज्ञानिक रूप से ठोस कदमों को अविलंब लागू करना होगा।
सर्वप्रथम, तूरान और मियानदश्त के बीच और इनके चारों ओर के बफर क्षेत्रों से सभी पारंपरिक पशुधन फार्मों और रेवड़ों का चरणबद्ध स्थानांतरण (voluntary buyout) किया जाना चाहिए ताकि चरवाहा कुत्तों के आतंक और चरागाह क्षरण को शून्य किया जा सके। द्वितीय, सेमनान-मशहद राजमार्ग के 36 किलोमीटर लंबे संवेदनशील हिस्से पर आधुनिक वन्यजीव बाड़बंदी और हरित ओवरपास (green overpasses) का निर्माण युद्धस्तर पर पूर्ण होना चाहिए।
तृतीय, गैर-सरकारी संगठनों, स्थानीय समुदायों और अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव विशेषज्ञों (जैसे IUCN Cat Specialist Group) के साथ पूर्ण वैज्ञानिक पारदर्शिता और सहयोग पुनः स्थापित किया जाना चाहिए। प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों से परे हटकर इस वैश्विक प्राकृतिक धरोहर के लिए वित्तीय और तकनीकी संसाधन जुटाने होंगे। यदि वैश्विक समुदाय और ईरान ने अपनी सामूहिक इच्छाशक्ति का परिचय नहीं दिया, तो 21वीं सदी में कैस्पियन बाघ के बाद एशियाई चीता मध्य पूर्व से विलुप्त होने वाला अगला महान शीर्ष शिकारी बन जाएगा।
References
- IUCN Red List – Acinonyx jubatus ssp. venaticus
- Encyclopaedia Iranica – Cheetah (Yuz)
- Iranian Cheetah Society (ICS) Research Reports
- Cat Specialist Group – Asiatic cheetah conservation in Iran
- United Nations Development Programme (UNDP) Iran – Cheetah Project
- Panthera – Asiatic Cheetah Campaign
- Department of Environment of the Islamic Republic of Iran
Frequently asked questions
एशियाई चीता और अफ्रीकी चीते में मुख्य रूपात्मक अंतर क्या है?
आनुवंशिक और रूपात्मक दृष्टि से एशियाई चीता (Acinonyx jubatus venaticus) अफ्रीकी चीते (Acinonyx jubatus jubatus) की तुलना में आकार में थोड़ा छोटा और अधिक गठीला होता है। इसके फर का रंग हल्का गेहुंआ-पीला होता है और शीत ऋतु में इसकी गर्दन के पिछले भाग पर छोटे अयाल (mane) तथा घने, लंबे बाल विकसित हो जाते हैं, जो इसे ईरानी पठार के शीत मरुस्थलीय तापमान से बचाते हैं।
ईरान में एशियाई चीते किन संरक्षित क्षेत्रों में पाए जाते हैं?
वर्तमान में एशियाई चीते मुख्य रूप से ईरान के केंद्रीय और पूर्वी मरुस्थलीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इनमें सेमनान प्रांत का तूरान बायोस्फीयर रिजर्व, उत्तरी खोरासान का मियानदश्त वन्यजीव अभयारण्य, दश्त-ए कवीर का कवीर राष्ट्रीय उद्यान, और यज़्द प्रांत के दर्रेह अंजीर वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं। तूरान वर्तमान में सबसे व्यवहार्य प्रजनन आबादी वाला क्षेत्र माना जाता है।
भारत से एशियाई चीता कब और कैसे विलुप्त हुआ?
भारत में एशियाई चीते की अंतिम दर्ज हत्या 1947 में कोरिया (वर्तमान छत्तीसगढ़) के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव द्वारा की गई थी। इसके बाद 1952 में भारत सरकार ने एशियाई चीते को आधिकारिक तौर पर देश से विलुप्त घोषित कर दिया। अत्यधिक शिकार, ट्रॉफी हंटिंग और खुले घास के मैदानों के कृषि भूमि में तब्दील होने से इनका पर्यावास पूरी तरह नष्ट हो गया था।
ईरान में एशियाई चीतों की अनुमानित जनसंख्या कितनी है?
ईरानी पर्यावरण विभाग और वन्यजीव अनुसंधानकर्ताओं के हालिया कैमरा-ट्रैप आकलनों के अनुसार, ईरान के जंगलों में एशियाई चीतों की संख्या 30 से 40 के बीच आंकी गई है, जिनमें प्रजननक्षम मादाओं की संख्या चिंताजनक रूप से एकल अंकों (10 से कम) में सिमट गई है। यह आंकड़ा इस उपप्रजाति को पृथ्वी पर सबसे दुर्लभ बड़े मांसाहारी जीवों में से एक बनाता है।
सड़क दुर्घटनाएं एशियाई चीतों के लिए कितना बड़ा खतरा हैं?
तेहरान-मशहद राष्ट्रीय राजमार्ग, जो विशेष रूप से तूरान संरक्षित क्षेत्र की उत्तरी सीमा से होकर गुजरता है, एशियाई चीतों की मृत्यु दर का एक प्रमुख कारक रहा है। पिछले दो दशकों में दर्ज चीतों की अप्राकृतिक मौतों में से 50% से अधिक केवल सड़क पार करते समय वाहनों की टक्कर से हुई हैं, जिसने प्रजननक्षम मादाओं और शावकों को भारी नुकसान पहुँचाया है।
संरक्षण परियोजना (CACP) का मुख्य उद्देश्य क्या था?
कंजर्वेशन ऑफ द एशियाटिक चीता प्रोजेक्ट (CACP) वर्ष 2001 में ईरानी पर्यावरण विभाग, यूएनडीपी (UNDP) और वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) द्वारा शुरू किया गया था। इसका प्राथमिक उद्देश्य प्रमुख अभयारण्यों में शिकार-रोधी निगरानी को सुदृढ़ करना, स्थानीय चरवाहा समुदायों के साथ सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना, शिकार प्रजातियों (जैसे जेबेल और जंगली भेड़) का संरक्षण करना और जीपीएस कॉलरिंग के माध्यम से पारिस्थितिक गलियारों की पहचान करना था।